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मानव कि राहें : लेखक आदर्श पाण्डेय

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मानव कि राहें : लेखक आदर्श पाण्डेय

मानव जिस गति चल रहा है वो मुझे हैरान करता है।। भारत साधुत्व का नगरी है।। यहां रिश्ते युगों युगों तक निभाने वाले लोग थे।। और आज का भारत रिश्ते को तो लज्जित कर दिया।। ऐसे संगीन और बड़े अपराध घटित हो रहे है।। निरंतर प्रक्रिया बढ़ती जा रहा है।। सत्ता निरंकुश कि भाती बैठी हुई है।। धर्म मज़हब मंदिर मस्जिद आदि संस्कृति चीजों को छेड़ कर प्रजा को उकसा कर लड़वा रही है।। मीडिया मुखदर्शन बनकर सबको दिखा रही है।। और लोग मुखदर्शन कि तरह लाइक कमेंट कर रहे है।। 

भ्रमित मानव जातियां खुद को मशीन के हवाले कर रही हैं।।

सवालों का जवाब अगर सही समय पर दिया जाए तो सत्य और असत्य में फर्क मालूम पड़ जाता है।। अगर सवालों का जवाब सही समय पर नहीं दिया गया भले बाद में दिया गया वो भी सत्य दिया गया हो लेकिन वो अर्थहीन उत्तर होगा।। सवालों के क़त्ल होने के बाद जो सवालों का उत्तर मिलता है भली वो सत्य हो लेकिन समय के लिए वो दिया गया उत्तर अर्थहीन होगा।। 

मान लो मैं किसी से सुबह 10 बजे पूछा कि वो खाना खाया अब आदमी रात को 10 बजे बोले कि मैं खाना खाया तो क्या उस समय उस उत्तर का कोई मिलाप होगा।। 

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